तेरे गेशुओं को चेहरे से हटाऊं इस तरह,
एक समंदर साहिल को छू रहा हो जिस तरह.
मैं तुम्हें प्यार करूँ भींच कर बाँहों में इस क़दर,
के एक तूफ़ान बरपा हो सेहरा में जिस तरह.
मैं तेरा श्रृंगार करूँ अपने हाथों से इस तरह के,
किसी बाग़ में फूल खिल पड़े हों जिस तरह.
ये मेरी आरजू है, खुद से जुदा तुझे ना होने दूँ,
के लहू जिस्म में दौड़ रहा हो जिस तरह.
एक समंदर साहिल को छू रहा हो जिस तरह.
मैं तुम्हें प्यार करूँ भींच कर बाँहों में इस क़दर,
के एक तूफ़ान बरपा हो सेहरा में जिस तरह.
मैं तेरा श्रृंगार करूँ अपने हाथों से इस तरह के,
किसी बाग़ में फूल खिल पड़े हों जिस तरह.
ये मेरी आरजू है, खुद से जुदा तुझे ना होने दूँ,
के लहू जिस्म में दौड़ रहा हो जिस तरह.
2 comments:
kya baat hai janab, gajab kar diya.narayan narayan
चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है
उम्मीद है आपके लेखन में निरंतरता बनी रहेगी
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